भारत–अमेरिकी भू-राजनीतिक संबंधों की वास्तविकता 

भारत–अमेरिकी भू-राजनीतिक संबंधों को समझने की कोशिश केवल कूटनीतिक वक्तव्यों, शिखर सम्मेलनों की तस्वीरों और रक्षा सौदों की घोषणाओं के आधार पर नहीं की जा सकती। इसके लिए उस व्यापक वैश्विक परिप्रेक्ष्य को देखना होगा, जिसमें अमेरिका अपनी घटती हुई लेकिन अब भी निर्णायक वैश्विक प्रभुता को बचाए रखने के लिए नए-नए साझेदार खोज रहा है और भारत अपनी आकांक्षाओं, आशंकाओं और आंतरिक सीमाओं के साथ स्वयं को एक “उभरती हुई महाशक्ति” के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा है।

पिछले दस-बारह वर्षों में भारत लगातार अमेरिका के भू-राजनीतिक नेटवर्क में फिट होने की कोशिश करता रहा है, कई बार अपने दीर्घकालिक हितों, रणनीतिक स्वायत्तता और ऐतिहासिक अनुभवों की अनदेखी करते हुए। यह कोशिश ऐसे समय में तेज़ हुई है, जब वैश्विक शक्ति संतुलन एकध्रुवीयता से बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद अमेरिका ने कभी भारत को अपने नेतृत्व वाले गठबंधनों में एक स्वतंत्र, बराबरी की भूमिका देने की इच्छा स्पष्ट रूप से नहीं दिखाई।

शीत युद्ध के बाद अमेरिका ने स्वयं को “नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था” का संरक्षक घोषित किया। वास्तव में यह व्यवस्था अमेरिकी हितों और उसकी आर्थिक-सैन्य शक्ति के इर्द-गिर्द निर्मित थी। चीन के तेज़ी से उभार, रूस के पुनरुत्थान, वैश्विक दक्षिण की बढ़ती असंतुष्टि और आंतरिक अमेरिकी संकटों ने इस व्यवस्था को चुनौती दी। ऐसे में अमेरिका को एशिया में ऐसे साझेदार की ज़रूरत थी जो चीन को संतुलित कर सके, बिना यह सवाल उठाए कि नेतृत्व किसके हाथ में रहेगा।

भारत इस भूमिका के लिए स्वाभाविक उम्मीदवार के रूप में देखा गया—एक विशाल जनसंख्या, बढ़ती अर्थव्यवस्था, चीन के साथ सीमा विवाद और हिंद महासागर में रणनीतिक स्थिति। लेकिन इस “स्वाभाविकता” के भीतर एक बुनियादी असमानता छिपी हुई थी: अमेरिका भारत को साझेदार नहीं, साधन के रूप में देख रहा था।

पिछले एक दशक में भारत की विदेश नीति का एक केंद्रीय दावा यह रहा है कि भारत अब पहले से कहीं अधिक ताक़तवर, आत्मविश्वासी और वैश्विक मंच पर निर्णायक भूमिका निभाने में सक्षम है। “मल्टी-अलाइनमेंट” और “रणनीतिक स्वायत्तता” जैसे शब्दों का प्रयोग लगातार किया गया। लेकिन व्यवहार में भारत का झुकाव तेज़ी से अमेरिका के नेतृत्व वाले ढांचे की ओर हुआ।

क्वाड जैसे मंचों में सक्रिय भागीदारी, लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज समझौते, रक्षा तकनीक और हथियारों की बढ़ती खरीद, और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अमेरिकी भाषा के करीब आती हुई कूटनीति—इन सबने यह संकेत दिया कि भारत स्वयं को अमेरिका-केंद्रित व्यवस्था में एक जिम्मेदार खिलाड़ी के रूप में स्थापित करना चाहता है। समस्या यह है कि इस प्रक्रिया में भारत ने अक्सर यह मान लिया कि अमेरिका उसे चीन के मुक़ाबले में एक अपरिहार्य शक्ति के रूप में स्वीकार कर चुका है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल और कठोर है।

बीते एक साल में घटित घटनाओं ने भारत की आर्थिक, तकनीकी और सैन्य ताक़त की सीमाओं को अधिक स्पष्ट रूप से उजागर किया है। वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान, तकनीकी निर्भरता, रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता के दावों और वास्तविक क्षमताओं के बीच का अंतर, तथा सीमा पर चीन के साथ जारी तनाव—इन सबने यह दिखा दिया कि भारत अभी उस स्थिति में नहीं है, जहाँ वह स्वतंत्र रूप से किसी महाशक्ति को संतुलित कर सके।

चीन, जिसकी अर्थव्यवस्था लगभग 20 ट्रिलियन डॉलर के आसपास है, न केवल भारत का पड़ोसी है बल्कि उसकी औद्योगिक, तकनीकी और सैन्य क्षमता भारत से कई गुना अधिक है। दूसरी ओर अमेरिका, जिसकी अर्थव्यवस्था 30 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है, भारत को उस नज़र से देखता है जिसमें सहयोग हमेशा शर्तों से बंधा होता है।

ऐसे संदर्भ में हर पाँच मिनट में चार ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का ढिंढोरा पीटना प्रतीकात्मक आत्मविश्वास से अधिक कुछ नहीं लगता। आर्थिक आकार महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है आर्थिक संरचना, तकनीकी गहराई और वैश्विक वित्तीय प्रणाली में वास्तविक प्रभाव। भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी आयातित तकनीक, ऊर्जा और पूंजी पर निर्भर है।

अमेरिका यह भली-भांति जानता है और इसी ज्ञान के आधार पर वह भारत से “साझेदारी” की कीमत वसूलता है। यह कीमत कभी रणनीतिक चुप्पी के रूप में, कभी बाजार खोलने के दबाव के रूप में, और कभी वैश्विक मुद्दों पर अपेक्षित समर्थन के रूप में सामने आती है।

भारत-अमेरिका संबंधों में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अमेरिका ने कभी भारत को अपने गठबंधनों में स्वतंत्र नीति निर्धारण की पूरी छूट देने का संकेत नहीं दिया। नाटो में शामिल देशों का अनुभव इसका उदाहरण है, जहाँ औपचारिक संप्रभुता के बावजूद रणनीतिक निर्णय अंततः वाशिंगटन के हितों से संचालित होते हैं। भारत को इस श्रेणी में औपचारिक रूप से शामिल नहीं किया गया है, लेकिन अपेक्षाएँ उसी तरह की हैं—कि भारत अमेरिकी रणनीति के अनुरूप व्यवहार करे, विशेषकर चीन, रूस और पश्चिम एशिया के संदर्भ में।

रूस के साथ भारत के ऐतिहासिक संबंधों और ऊर्जा-रक्षा सहयोग पर लगातार दबाव इसी मानसिकता का परिणाम हैं।

यह स्थिति भारत के लिए इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि वह न तो अमेरिका का पूर्ण भरोसेमंद सहयोगी बन सकता है और न ही चीन के साथ किसी सहज सहअस्तित्व की स्थिति में है। इस दोधारी तलवार पर चलना तभी संभव होता, जब भारत के पास पर्याप्त आर्थिक और तकनीकी स्वायत्तता होती। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में भारत अक्सर प्रतिक्रियात्मक कूटनीति करता दिखता है—घटनाओं के पीछे-पीछे चलते हुए, उन्हें आकार देने के बजाय। अमेरिका इस कमजोरी को समझता है और इसलिए वह भारत को “उभरती शक्ति” कहकर उसकी प्रशंसा तो करता है, लेकिन निर्णयात्मक शक्ति देने से बचता है।

पिछले दशक की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि भारत ने जिस रणनीतिक लाभ की उम्मीद में अमेरिका के साथ अपनी निकटता बढ़ाई, वे लाभ अपेक्षाकृत सीमित रहे हैं। रक्षा सौदों से भारत को अत्याधुनिक हथियार मिले हैं, लेकिन उनके साथ निर्भरता भी बढ़ी है। तकनीकी सहयोग की बात हुई है, लेकिन महत्वपूर्ण तकनीकों में वास्तविक हस्तांतरण अब भी सीमित है।

वैश्विक मंचों पर समर्थन की अपेक्षा की गई थी, लेकिन जब भारत को ठोस कूटनीतिक समर्थन की ज़रूरत पड़ी, तब अमेरिका ने अपने हितों को प्राथमिकता दी। इसके बदले भारत ने कई बार ऐसे मुद्दों पर चुप्पी साधी या नरम रुख अपनाया, जो उसके पारंपरिक स्वतंत्र विदेश नीति के दावे से मेल नहीं खाते।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत अपनी विदेश नीति को केवल “ताक़तवर दिखने” की परियोजना तक सीमित रखेगा या अपनी वास्तविक क्षमताओं, सीमाओं और दीर्घकालिक हितों के आधार पर एक संतुलित रणनीति विकसित करेगा।

अमेरिका के साथ संबंध महत्वपूर्ण हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन किसी भी महाशक्ति के साथ संबंध तभी सार्थक होते हैं, जब वे समानता, पारस्परिक सम्मान और स्वतंत्र निर्णय क्षमता पर आधारित हों। फिलहाल भारत-अमेरिका संबंधों में यह संतुलन स्पष्ट रूप से अमेरिका के पक्ष में झुका हुआ है।

वैश्विक शक्ति संतुलन के बदलते दौर में भारत के सामने विकल्प सीमित नहीं हैं, लेकिन उन्हें अपनाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और रणनीतिक स्पष्टता की ज़रूरत है। बहुध्रुवीय दुनिया में भारत तभी वास्तविक भूमिका निभा सकता है, जब वह स्वयं को किसी एक शक्ति की परिधि में परिभाषित करने के बजाय अपने क्षेत्रीय, आर्थिक और सामाजिक हितों को केंद्र में रखे।

अन्यथा चार ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का शोर, बीस ट्रिलियन डॉलर की पड़ोसी चुनौती और तीस ट्रिलियन डॉलर की महाशक्ति की अपेक्षाओं के बीच भारत केवल एक ऐसे खिलाड़ी के रूप में रह जाएगा, जिससे हर बार यही पूछा जाएगा—“हाल में तुमने मेरे लिए क्या किया है?”

(शैलेंद्र चौहान कवि-लेखक हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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